Navratri Festival Scientific Spirituality Behind Navratri in Hindi

दोस्तों आज हम नवरात्रि पर्व नवरात्रि का अध्यात्मिक-वैज्ञानिक महत्व (Navratri Festival Scientific Spirituality Behind Navratri in Hindi) के बारे में आज जानेगे की ये जो हम नवरात्री पर्व को मानते है इसको मानाने के पीछे का अधत्मिन क्या महत्व है और नवरात्री मानाने के पीछे क्या विज्ञान छिपा हुवा है तो चलिए इस पोस्ट के माध्यम से जानते है और समझते है इस इनफार्मेशन को शेयर जरुर करे ताकि बाकि लोगो को भी इसके बारे में पता चले 🙂

नवरात्रि पर्व नवरात्रि का अध्यात्मिक-वैज्ञानिक महत्व  (Navratri Festival Scientific Spirituality Behind Navratri in Hindi)

नवरात्रि (Navratri) सबसे महत्वपूर्ण बड़ी खुशी, उत्साह और हमारी भारतीय संस्कृति में परंपरा के साथ मनाया त्योहारों में से एक है। देवी दुर्गा के साथ जुड़े, नौ दिन उपवास अनुष्ठान धार्मिक महत्व और मान्यताओं से जुड़ी यह का एक बहुत बड़ा पर्व  है। नकारात्मक और बुरे विचारो पर सकारात्मकता और अच्छाई की जीत का प्रतीक है, नवरात्रि सचमुच 'नौ रातों' संस्कृत में इसका मतलब है; नव - नौ और शिवरात्रि। और इस अवधि के दौरान उपवास और पूजा वास्तव में एक दिव्य कनेक्शन की खेती करते हुए सभी नौ प्रत्येक दिन के लिए समर्पित देवी को श्रद्धा का भुगतान करने का एक अध्यात्मिक-वैज्ञानिक माध्यम हैं (Navratri Festival Scientific Spirituality Behind Navratri in Hindi)।

यह त्योहार देश भर में मनाया लेकिन उत्तर भारत में काफी लोकप्रिय है और वहाँ कई लंबी कहानियों कि विश्वास और महानता इस उत्सव के साथ, हम ब्लॉग पर जुड़े समर्थन करने के लिए हिंदू ग्रंथों से बाहर आकर कुछ पेश कर रहे है आज हम कुछ उजागर करने के लिए जा रहे हैं नवरात्रि के पीछे वैज्ञानिक कारण हैं।

नवरात्रि (Navratri) एक वर्ष में दो बार मनाया जाता है। एक बार गर्मियों की शुरुआत में और दूसरी सर्दियों की शुरुआत में, दो मौसमी परिवर्तन की बहुत महत्वपूर्ण मौकों पर। आयुर्वेदिक नजरिए से इस समय के दौरान, मांस, अनाज, शराब, प्याज, लहसुन आदि को आकर्षित करने और नकारात्मक ऊर्जा को अवशोषित और सख्ती से बचा जाना चाहिए, क्योंकि हमारे शरीर के प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाने से बीमारी  के लिए अतिसंवेदनशील होते हैं। नवरात्री (Navratri) में हमारे मानसिक सफाई और हमारे शरीर स्वास्थ्य के लिए आती है।

“साधना नवरात्री की “ दिव्यता अनुगामी है।

श्रेष्ठतम साधना में साधना की स्वामिनी है।। 

एक अध्यात्मिक प्रयास  

नवरात्री एक तरीका है जिसमे साधक शाश्वत सुख और आनंद के लिए दिव्य शक्ति का आह्वान कर सकते हैं। यह सुरक्षा, इस भौतिकवादी दुनिया में स्पष्टता और सत्ता के लिए अभ्यास है। यह एक तरह का एकांतवास है जो आपके भीतर की छमताओ  की पहचान करता है।  आप अपने  भीतर के देवत्व के लिए अध्यात्मिक  शांति का अनुभव जप, ध्यान के माध्यम से कर सकते है। यह आपको आपके आनंद से जोड़ता है जब आप आने लिए कुछ समय निकलते है। यहां तक कि अगर तुम जिस तरह से आप अपने आप को और अपने मन में बना रहे हो  यह ध्यान उस विकल्प को सफल बनाने में मदद करता है। शांति के रूप में आप के भीतर की सभी नकारात्मक ऊर्जा को बाहर  छोड़ते है और अपने केंद्र के लिए वापस आने के लिए यह आपके भीतर के स्व जागता है। आप महसूस करते है की आपका आत्म सम्मान बढ़ जाता है, आप स्वयं को पसंद करते हैं और नकारात्मक विचारो को हटा कर  मस्तिष्क की गतिविधियों में काफी सुधार करते है। इसीलिए नवरात्री की यह बेला आपके जीवन की बैट्री को बार - बार अध्यात्मिक उर्जा से चार्ज करने के लिए हर छह माह में आती हैं कि अगर इस दौरान अगर आपके अंतस्थल में कोई कल्मष कषाय आ गया हो तो उसको परिमार्जित किया जा सके।

स्व-अनुशासन

नवरात्री सकारात्मक इरादों के साथ एक नया आत्म अनुशासन शुरू करती हैं । इसके अलावा, नवरात्रि में नौ दिनों में जो पापों / शैतानों कि हमारे अपने मन के अंदर रहते हैं उनको हटाने का एक तरीका है। आंतरिक शुद्धि को बढ़ाने  के लिए आप आत्म-निरिक्षण, आत्म-सुधार, और आत्म-परिष्कार के  प्रशिक्षण-प्रयास द्वारा इनको दूर  कर सकते है। नौ शैतानों इस प्रकार हैं -

1) काम

2) क्रोध

3) लोभ

4) मोह

5) अहंकार

6) डर

7) इर्ष्या

8) जड़ता

9) नफरत

हमारा पूरा जीवन केवल हमारे मन से इन सभी काले बादलों के चलते आध्यात्मिक भीतर घर वापस करने के लिए कनेक्ट करने के लिए एक उद्देश्य है, और तुम व्यावहारिक रूप से अपने को मजबूत कर इन राक्षसों को नष्ट कर सकते हो , इसमें वो मज़ा और शांति है जो कि शब्दों में नहीं लिखा जा सकता है। इसके साथ ही जीवन में आनंद का अनुभव करने के लिए जब आप दोषों को हटाने के लिए तैयार होते हैं।

चिकित्सा एवं स्वास्थ्य

उपवास, वजन घटाने में एक सामान्य परहेज़ की तुलना में ज्यादा प्रभावी ढंग है, यह अपने शरीर की संरचना को नियंत्रित करने के लिए सबसे सुरक्षित तरीका है। इसे प्रभावी ढंग से कैलोरी जलाने के लिए के माध्यम से अपने चयापचय दर में सुधार लाने में मदद करता है और यह अपने शरीर में अपने प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करता है।

नवरात्री का समय दो ऋतुओ का संधिकाल होता है, इस समय मौसम में बदलाव हो रहे होते है अधिकतर लोग इसी समय बीमार होते है हमारे प्राचीन मनीषी ऋषि कहलाते है ऋषि वो होता था जो रिसर्च करता था उन्होंने जब इसका उपाय सोचा तो उनको उपवास ही सबसे अच्छा लगा और उनने इसको अध्यात्मिक परम्परा के साथ जोड़ दिया अगर हम नवरात्री में उपवास रखते है तो अगले छह माह तक प्रतिरक्षा प्रणाली मजबूत बनी रहती है।

आजकल उपवास के दौरान लोगों को या तो भोजन पूरी तरह से बंद कर रहे हैं, या वे पर "नवरात्र विशेष" तला हुआ सामान और नाश्ता से अनजाने में वे एक नियमित रूप से दिन पर की तुलना में कैलोरी की संख्या दोगुनी खपत करते हैं, आप ऐसा न करे। अच्छा तो यही है कि एक बार भोजन और बीच- बीच में कुछ पेय पदार्थ ले लिए जायें, पर वैसा न बन पड़े तो दो बर भी शाकाहार, दही आदि लिया जा सकता है, जिनसे इतना भी न बन पड़े वे अन्नाहार पर भी रह सकते हैं ।

CORRELATION OF NAVRATRI AND HEALTH ACCORDING TO ASTROLOGY

नवरात्र का धार्मिक, आध्यात्मिक, लौकिक और शारीरिक दृष्टि से बड़ा महत्त्व है। शिव और शक्ति की आराधना से जीवन सफल और सार्थक होता है।
नवरात्र पर्व हमेशा चैत्र और आश्विन मास में ही होते हैं ! इसका भी एक वैज्ञानिक कारण है कि मौसम-विज्ञान के अनुसार ये दोनों ही मास सर्दी,गर्मी की सन्धि के महत्वपूर्ण मास हैं। यूँ तो ऋतुऎं कहने को छ: मानी जाती हैं परन्तु यदि देखा जाए तो हैं तो वे दो ही—-एक गर्मी और दूसरी सर्दी।
शीत ऋतु का आगमन आश्विन मास से आरंभ हो जाता है और ग्रीष्म का चैत्र मास से। ज्यों हि एक ऋतु का पदार्पण हुआ कि सम्पूर्ण भौतिक जगत में एक हलचल प्रारंभ होने लगती है। पेड-पौधे,वनस्पति जगत,जल,आकाश और वायुमंडल तक सबमें परिवर्तन होने लगता है। ये दोनो मास दोनों ऋतुओं के संधिकाल है,अत: हमारे स्वास्थय पर इनका विशेष प्रभाव पडता है। चैत्र में गर्मी के प्रारंभ हो जाने से पिछले कईं मास से जो रक्त का प्रवाह मंद था,अब वो हमारी नसों नाडियों में तीव्र गति से प्रवाहित होने लगता है। केवल रक्त की ही बात नहीं यह नियम शरीर के वात,पित्त,कफ इन तीनों तत्वों पर भी लागू होता है। यही कारण है कि संसार के अधिकांश रोगी इन दोनों मासों में या तो शीघ्र अच्छे हो जाते हैं या फिर मृ्त्यु को प्राप्त होते हैं। इसलिए शास्त्रकारों नें सन्धि काल के इन्ही मासों में शरीर को पूर्ण स्वस्थ रखने के लिए नौ दिन तक विशेष रूप से व्रत-उपवास आदि का विधान किया है।
नव रक्त संचारी वसन्त के इन मादक दिनों में मन में विषय वासना की नईं तरंगें भी मन को खूब आंदोलित करती हैं,किन्तु यदि ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए इन नौ दिनों में आपके विधिपूर्वक व्रत-उपवास का आश्रय लिया तो समझिए कि आगामी ऋतुकाल के लिए आपने अपने भीतर शक्ति का संचय कर लिया—जिसका फल आपको ये मिलेगा कि आगामी ऋतु परिवर्तन तक न तो कोई रोग,व्याधी और न किसी प्रकार की चित्त की विकलता ही आपको पीडित करेगी।

उपवास के दौरान अन्न न खाने के पीछे वैज्ञानिक कारण यह है कि हमारे शरीर के लिए कभी-कभी भूखा रहना भी फायदेमंद होता है। उपवास करने पर हम अन्नादि नहीं खाते हैं जिससे हमारे पाचन तंत्र को आराम मिलता है। व्रत के दौरान हम बहुत नियम से संतुलित खाना खाते हैं जो कि हमारी सेहत के लिए बहुत अच्छा रहता है। व्रत में नियम के अनुसार खाने से कब्ज, गैस, इनडाइजेशन, सिरदर्द, बुखार आदि बिमारियों का असर कम होता है !

ये जो पर्व है,इसे रात्रि प्रधान माना गया है। जैसा कि आप देखते हैं कि इसके नाम के साथ ही रात्रि शब्द जुडा हुआ है(नव+रात्रि)। इस विषय में शास्त्र वाक्य है कि “रात्रि रूपा यतोदेवी, दिवा रूपो महेश्वर:” अर्थात दिन को शिव(पुरूष) रूप में तथा रात्रि को (शक्ति) प्रकृ्ति रूपा माना गया है। एक ही तत्व के दो स्वरूप हैं फिर भी शिव(पुरूष) का अस्तित्व उसकी शक्ति(प्रकृ्ति) पर ही आधारित है। यदि आप शक्ति(देवी) के उपासक हैं और उनके निमित किसी भी प्रकार का मंत्र जाप,पाठ इत्यादि करते हैं तो सदैव रात्रिकाल का ही चुनाव करे !

नवरात्री की आप सभी को शुभकामनाए !

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