Beliefs Attributes and Specialties of Indian Culture in Hindi

दोस्तों आज की पोस्ट में हम भारतीय संस्कृति (Indian Culture) के बारे में बात करेंगे और भारतीय संस्कृति की मान्यताएं एवं विशेषताएं  ( Beliefs Attributes and Specialties of Indian culture in Hindi ) के बारे में जानेगे मेरे हिसाब से हर भारतवासी को अपनी भारतीय संस्कृति के बारे में जानना चाहिए और समझना चाहिए उम्मीद है की आपको ये जानकारी अच्छी लगेगी और आपको कुछ नया जानने मिलेगा

भारतीय संस्कृति की मान्यताएं एवं विशेषताएं  ( Beliefs Attributes and Specialties of Indian culture in Hindi )

आइये, भारतीय संस्कृति की कुछ मान्यताओ (Recognition and specialties of Indian culture) का पर्यवेक्षण करें और देखें कि कोई कुशल माली उद्यान में पेड़ पौधों को संभाल सुधार कर उन्हें सुरम्य उद्यान के रूप में जिस तरह विकसित करता है, उसी तरह मनुष्य को देवत्व की दिशा में अग्रसर करने के लिए अपूर्णता से पूर्णता तक पहुंचाने के लिए संस्कृति उपयोगी है या नहीं । मानवी विकास अब एकता की आवश्यकता अनुभव कर रहा है। बिखराव विभाजन और बिलगाव की हानियां क्रमश: से अधिक अच्छी तरह समझी जा सकती हैं। इस सार्वभौम एकता की एक अति महत्वपूर्ण कड़ी है संस्कृति। तत्वदर्शी महर्षिओं ने एक ऐसी संस्कृति का अब से लाखों करोड़ों वर्ष पूर्व निर्माण किया था, जिसे बिना देश, काल, वर्ग, वर्ण का भेद किए मानवीय आदर्शों की स्थापना के लिए समान रूप से अपनाया सर्वतोमुखी लाभ उठाया जा सके।

1. भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता है स्वतंत्र विचार। इस संस्कृति में प्रत्येक विचार पद्धति को विकसित होने और पनपने देने की छुट है । सत्य की शोध के लिए हर प्रयोग की गुंजाइस है । भारतीय संस्कृति को बौधिक प्रजातंत्र कह सकते हैं। प्रजातंत्र में नागरिको को लेखन, भाषण, निर्वाह, धर्म आदि के भौतिक अधिकारों की मान्यता दी गई है। विचार क्षेत्र को भी ठीक इसी तरह की मान्यता केवल भारतीय धर्म में प्रदान की है । अन्य धर्म एक ही पैगम्बर और एक ही धर्मशास्त्र और एक ही विधान को मान्यता देते हैं । अन्य प्रकार से सोचने वालों का दमन करते हैं । यह अधिनायकवाद होता है। इससे विवेक और चिंतन के विनास की सम्भावना समाप्त होती है। भारत में वैज्ञानिक ढंग से विचार स्वतान्त्य की छुट दी है और कहा है कि नित्य की नई शोध पूर्व मान्यताओं से विपरीत जाती है तो उसे पूर्वजो की अवहेलना नहीं चिंतन की प्रगति मन जाना चाहिए। समस्त विश्व की प्रगति के लिए विचार स्वतान्त्य के आधार पर सत्य की शोध को चलने देंने की आवश्यकता को सर्वप्रथम मान्यता देते हुए एकता और सहिष्णुता का परिचय दिया गया है।

2. भारतीय संस्कृति की दूसरी मान्यता है कर्मफल की मान्यता। पुनर्जन्म के सिद्धान्त में जीवन को अवांछनीय माना गया है और मरण की उपमा वस्त्र परिवर्तन से दी गई है कर्मफल की मान्यता नैतिकता और सामाजिकता की रक्षा के लिए नितान्त आवश्यक है ।मनुष्य की चतुरता अद्भुत है वह सामाजिक विरोध और राज दण्ड से बचने के लिए अनेक हथकंडे अपनाकर कुकर्म कर सकता है ऐसी दशा में किसी सर्वग्य सर्वसमर्थ सत्ता की कर्मफल व्यवस्था का अंकुश ही उसे सदाचरण की मर्यादा में बांधे रह सकता है । परलोक की, स्वर्ग - नरक की, पुनर्जन्म की मान्यता यह समझाती है कि आज नहीं तो कल, इस जन्म से नहीं तो अगले जन्म में कर्मफल तो भोगना ही पड़ेगा। दुष्कर्म का लाभ उठाने वाले यह न सोंचे कि उनकी चतुरता सदा काम देती रहेगी और पाप के आधार पर लाभान्वित होते रहेंगे । इसी प्रकार जिन्हें सत्कर्मो के सत्परिणाम नहीं मिल सके हैं। उन्हें भी निराश होने की आवश्कता नहीं है। अगले दिनों वे भी अदृश्य व्यवस्था के आधार पर मिल कर रहेंगे । ईश्वरीय सत्ता को कर्मफलदायी शक्ति के रूप में भारतीय संस्कृति ने मनुष्यों को अति महत्त्वपूर्ण प्रेरणा यही दी है की वे नैतिक एवं सामाजिक मर्यादायों के पालन में न केवल लोकमत और शासनतंत्र वरन आत्मिक और दैवीय विधान के आधार पर भी बंधे हुए हैं । कहना होगा की यह आस्थाए व्यक्ति को उत्कृष्ट और समाज को आदर्श बनाने में असाधारण योगदान प्रस्तुती करती हैं ।

3. भारतीय संस्कृति में जीवात्मा को परमात्मा का पवित्र अंग माना गया है उसके लिए शारीरिक कलुष एवम् मानसिक कल्मषो के भव - बन्धनों से छूटकर उदात्त दृष्टिकोण अपनाना और जीवन्मुक्ति प्राप्त करना चरम लक्ष्य ठहराया गया है उत्कृष्ट चिंतन के आधार पर स्वर्गीय मन:स्थिति एवं परिस्थिति बनाने के लिए कथा अलंकारों का सुविस्तृत साहित्य रचा गया है ब्रह्मविद्या का तत्व ज्ञान आत्मवत सर्वभूतेषु की, मातृव्रत पर दारेषु की, वशुधैवकुटुम्बकम की मान्यताओ को ह्रदयंगम करने की प्रेरणा देता है इन्हें मात्र कहने सुनने भर की बात समझा जाय तब तो बात दूसरी है, अन्यथा यदि निष्ठा पूर्वक व्यावहारिक जीवन में यह आदर्श उतरने लगे तो सर्वत्र सतयुगी द्रश्य उपस्थित हो सकते हैं 

4. भारतीय संस्कृति में परमात्मा को इष्टदेव माना गया है "इष्ट"का अर्थ है "लक्ष्य"। जीवन को क्षुद्रता के परिधि से निकलकर ईश्वर के समान उदात्त और पवित्र होना चाहिए। इसी स्थिति को प्राप्त करना जीवन लक्ष्य बताया गया है इसमें जीवात्मा को क्रमशः महान आत्मा, देवात्मा और परमात्मा बनने की दिशा में अग्रसर करने वाली उत्कृष्टता को अपनाने की प्रेरणा है। निराकार ईश्वर को अन्तकरण की सद्भावनाओं में चिंतन की पवित्रता और कर्मो की श्रेष्टता में परिलक्षित होना बताया गया है साकार ईश्वर यह विराट विश्व है । कृष्ण भगवान ने अर्जुन और यशोदा को, राम ने कौशल्या और काकभुसुंन्डी को अपना यही विराट रूप दिखाया था। शिवलिंग और शालिग्राम को गोलमटोल प्रतिमाये इस विश्व ब्रह्माण्ड को ईश्वर का द्र्श्यमान रूप मानने और प्राणियों के साथ सद्व्यवहार करने एवं पदार्थो का सदप्रयोग करने की प्रेरणा देती हैं। भारतीय संस्कृति की व्याख्या विवेचना करने वाली आध्यात्मिक एवं धार्मिक मान्यताए जन साधारण को अधिक आदर्शवादी अधिक पवित्र और अधिक लोकापयोगी बनने की ओर ही अग्रसर करती हैं ।

5. भारतीय संस्कृति में धर्म और सभ्यता को सर्वथा प्रथक रखा गया है धर्म के दश लक्षण भगवान मनु ने बताये हैं, योग शास्त्र में उन्हें यम - नियम कहा गया है सभ्यता में प्रथा, परम्परा के प्रचलनों की गणना होती है धर्म शाश्वत है अर्थात सामाजिक सदाचार के आधार मूल सिद्दान्त सनातन हैं प्रथा परम्पराये सामयिक है स्मृतिकार समयानुसार उनमें हेर फेर करते रहे हैं यह परिवर्तन प्रचलन आवश्यकतानुसार सदा ही होता रहेगा धर्म और सभ्यता का अंतरंग उद्देश्य एक ही है और वह है व्यक्तित्वों को उत्त्क्रिष्टतम स्थिति तक पहुचाने और उसे लोक मंगल के लिए अधिकाधिक त्याग - बलिदान करने के लिए प्रशिक्षित करना 

6. भारतीय संस्कृति में समाज व्यवस्था को चार भागो में बंटा गया है और व्यक्तिगत जीवन के चार विभाजन किये गए है समाज की आवश्कताओ में शिक्षा, सुरक्षा, सम्पत्ति और स्राम्निष्ठा प्रमुख हैं। इन्हीं के आधार पर सामूहिक प्रगति एवं कार्यक्रम निर्धारित करे यह कार्य रूचि और योग्यता के आधार पर ही अपनाये जा सकते हैं शिक्षा प्रयोजनों में संलग्न व्यक्तियों को ब्राह्मण कहा गया । सुरक्षा के लिए कटिबद्ध व्यक्तियों को क्षत्रिय कृषि, गोपालन, शिल्प, उद्योग और  व्यवसाय में निरत व्यक्तियों को वैश्य समाज को शारीरिक, मानसिक श्रम का सीधा लाभ देने वाले श्रमिक वर्ग को शुद्र कहा गया है यह विशुद्ध कार्य विभाजन है और इसमें रूचि एवं योग्यता को आधार माना गया है। इसमें ऊंच नीच की कोई बात नहीं है गुण, कर्म, स्वभाव के आधार पर वर्ण व्यवस्था बनती है, उसमे आवश्यकता अनुसार परिवर्तन भी होते रहते हैं।

7. समाज व्यवस्था के लिए कार्य विभाजन की तरह जीवन अवधि के भी भारतीय संस्कृति चार विभाजन प्रस्तुत करती है :-

  • ब्रह्मचर्य
  • गृहस्थ
  • वानप्रस्थ
  • संन्यास

इनमे से दो व्यक्तिगत जीवन के उत्कर्ष के लिए और दो सामाजिक विकास के लिए निर्धारित हैं। आधा जीवन शक्ति संवर्धन और भौतिक उत्पादन में लगाना चाहिए। शारीरिक और मानसिक क्षमता के विकास की पच्चीस वर्ष की आयु को ब्रह्मचर्य कहते हैं। पच्चीस से पचास वर्ष की आयु में गृहस्थ आश्रम में प्रवेश कर भौतिक उत्पादन बढाकर समद्धि का अभिवर्धन करना चाहिए। जीवन का आधा भाग उत्तरार्ध विशुद्ध रूप से लोक मंगल में नियोजित रखे जाने की शास्त्र मर्यादा है। ढलती आयु पचास से पचहत्तर वर्ष की आयु में वानप्रस्थ धारण किया जाय और घर परिवार को आवश्यक मार्ग दर्शन सहयोग देते हुए अधिकांश समय समाज सेवा में लगाना चाहिए। पचहत्तर के बाद संन्यास आश्रम प्रवेश का निर्देश दिया गया है। शरीर अधिक थक जाने पर परिव्रज्या का, पर्यटन का कार्य कठिन पड़ता है तब एक स्थान पर कुटी, आश्रम बनाकर साधना - शिक्षा स्वाध्याय आदि के लिए विद्यालय, चिकित्सालय, ग्रन्थ रचना योग साधना, सत्संग, परमर्श जैसे कार्यो को हाँथ में लिया जा सकता है। संक्षेप में परिव्राजक लोकसेवियों को वानप्रस्थी एवं ब्राह्मण कहा जाता है और आश्रमवासी साधुओ को सन्यासी।

8. भारतीय संस्कृति में प्रतीक पूजा का प्रचलन है देवी देवताओं की मुर्तिया, महापुरुषों की मुर्तिया, यहाँ तक की नदी, पर्वतों, वृक्षो, पशु - पक्षियों और चूल्हे चक्की, उखल, फसल जैसे उपकरणों की पूजा का प्रावधान रखा गया है स्थूल दृष्टि से यह सब जड़ पूजा का उपहासास्पद प्रयोग प्रतीत होता है किन्तु वस्तुतः वैसा है नहीं सूक्ष्म तक पहुचने के लिए स्थूल का प्रयोग किया जा सकता है कीटाणुओ और जीवाणुओं को खुली आँखों से नहीं देख पाते तो उसके लिए माइक्रोस्कोप का प्रयोग करते हैं भाव संवेदनाए अति सूक्ष्म होती हैं उनकी समृति एवं जागृति के लिए उपकरणों का प्रयोग किया जाता है उसे उचित एवं आवश्यक ही माना जाना चाहिए ज्ञान वृद्धि के लिए पुस्तक की आवश्यकता पड़ती है विचार अभिव्यक्ति के लिए लेखनी का उपयोग करना पड़ता है विचार अभिव्यक्ति के लिए लेखनी का उपयोग करना पड़ता है विचार सूक्ष्म हैं उनकी कोई आकृति नहीं बन सकती पर लेखनी से लिपिबद्ध करके उन्हें मुर्तिवान बना दिया जाता है। निराकार वादी भी कई प्रकार के प्रतिको का उपयोग अपनी श्रध्दाभिव्यक्ति  के लिए करतें हैं इसाइयों में क्रुस के चिन्ह का सम्मान है मुसलमान काबा की तरफ मुह कर के नमाज पढ़ते हैं और हज जाकर "सगे असवद" और बोसा लेकर अपनी यात्रा को सफल मानते हैं सगे असवद पत्थर ही तो है ताजिये निकालने और मस्जिद को खुदा का घर मानने की मान्यता भी प्रतीत पूजा कही जा सकती है। राष्टीय झंडे का सम्मान अभिवादन किया जाता है । बुद्धि लोग भी अपने पूर्वजो के चित्र टांगते हैं और उनका सम्मान करते हैं । भारतीय धर्म में प्रतीक पूजा के माध्यम से उपयोगी, उपकारी पदार्थों, शक्तियों एवं व्यक्तियों के प्रति कृतग्यता व्यक्त की जाती हैं और उनमें जो श्रेष्टता है उनके प्रति सम्मान व्यक्त करने एवं अपनाने का भाव है।

9. पारिवारिक शील शिक्षा के पशिक्षण के लिए संस्कारो का प्रचलन भारतीय संस्कृति का अविछिन्न अंग बना हुवा है माता के गर्भ में आने से लेकर मरण पर्यन्त प्रत्येक व्यक्ति के सोलह संस्कार होते थे इस धर्म समाहरोह में सम्बंधित व्यक्ति की तथा इससे सम्बंधित व्यक्तियों को ऐसा प्रशिक्षण दिया जाता था की व्यक्तित्व को उत्कृष्ट रखने के साथ - साथ पारिवारिक उत्तरदायित्वो का निर्वाह ठीक प्रकार होता रहे। धर्मानुष्ठानो में भावनात्मक वातावरण बन जाता है। उस उत्साह भरी मन: स्थिति में दिया गया शिक्षण अधिक प्रभावशाली और चिरस्थायी होती है , यह निश्चित है। वर्तमान परिस्थितियों में सोलह संस्कारों का प्रचलन तो कठिन है पर दस संस्कार आसानी से हो सकते हैं जो निम्नवत हैं :-

  1. पुंसवन संस्कार :- यह संस्कार गर्भावस्था के समय होता है जिसमें गर्भवती को आहार - विहार में सतर्कता रखने की आवश्यकता, उपयोगिता एवं व्यवस्था का शिक्षण दिया जाता है 
  2. नामकरण संस्कार :- यथा नाम तथा गुण के आधार पर श्रेष्ठ नाम रखते हुए पुरे परिवार को शिशु पालन एवं बच्चे के शारीरिक, मानसिक विकास के लिए आवश्यक जानकारियों का शिक्षण होता है
  3. अन्नप्रासन संस्कार :- जैसा खाये अन्न वैसा बने मन, बच्चे की पाचन क्षमता के हिसाब से उसे अन्न खिलाये जाने की  परम्परा थी खाद्य पदार्थ सम्बन्धी तथा खिलाने सम्बन्धी आवश्यक ज्ञान का परिचय इस संस्कार के माध्यम से होता है
  4. मुंडन संस्कार :- गर्भकाल के बालो को हटाना मस्तिष्क पर ब्रह्मा, विष्णु , शिव की स्थापना शिखा स्थापन करने तथा उसके साथ जुड़े हुए विचार विज्ञान के महत्त्व को बच्चे एवं परिवार को शिक्षण देने का क्रम है
  5. विद्यारंभ संस्कार :- अक्षरारम्भ समाहरोह के साथ साथ शिक्षा सम्बन्धी सामयिक ज्ञान का परिचय उसके शिक्षण का क्रम होता है
  6. यज्ञोपवित संस्कार :- इस संस्कार के माध्यम से मानवी उत्तरदायित्वो को कंधे पर उठाने की शपथ दिलाते हुए गुण कर्म, स्वभाव में आदर्शवादिता के समावेश का सर्वतोमुखी प्रशिक्षण
  7. विवाह संस्कार :- संयुक्त जीवन निर्वाह एवं परिवार निर्माण तथा संचालन के तथ्य, सूत्र और उत्तरदायित्वो की शिक्षा एवं प्रतिज्ञा
  8. वानप्रस्थ संस्कार :- ढलती आयु को लोक मंगल के लिए समर्पित करने की प्रेरणा का शिक्षण
  9. अन्तेष्ठी संस्कार :- मृत शरीर का अग्निहोत्र में समापन और मृतक के छोड़े उत्तरदायित्वो के निर्वाह का समस्त कुटुम्बियो को शिक्षण उद्बोधन देने का क्रम होता है
  10. मरणोत्तर श्राद्ध संस्कार :- मृतक के प्रति, पूर्वजों के प्रति श्राद्ध अभिव्यक्ति का क्रम, मृतक की छोड़ी सम्पति का असमर्थ कुटुम्बियों की निर्वाह व्यवस्था के लिए रखकर शेष को सतप्रयोजनों में नियोजित करने का शिक्षण एवं प्रेरणा स्मरण रहे कमाऊ बच्चे अपने पसीने की कमाई पर ही संतोष करते थे और पैत्रिक सम्पत्ति को हराम की कमाई समझकर उसे स्वर्गीय आत्मा की सद्गति विकास के लिए श्रध्दापूर्वक पुष्प प्रयोजनों में लगा देते थे इसी दान प्रकिया को श्राद्ध कहा गया है

10. सामाजिक सुव्यवस्था बनाये रखने के लिए पर्व त्यौहारों के सामूहिक समाहरोहो का प्रचलन भारतीय संस्कृति का अंग हैं पर्व त्योहार यो तो ढेर हैं पर उनमें दस को प्रमुख मान कर उनका सामूहिक प्रचलन जारी रखा जा सकता है :-

  1. राम नवमी राम जयंती चैत सुदी नवमी को मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के द्वारा प्रतिपादित मर्यादाओ से प्रकाश ग्रहण करने का दिन
  2. गंगा जयंती गायत्री जयंती जेष्ट सुदी दसमी, जीवन गंगा जैसी पवित्रता के साथ आदर्शवादी विवेक शीलता विकसित करने का दिन
  3. व्यास पूर्णिमा, गुरु पूर्णिमा आषाढ़ सुदी पूर्णिमा को गुरु द्वारा निर्धारित अनुशासनों का पालन, सर्वतोमुखी अनुशासन का पर्व
  4. उपनयन पर्व श्रावणी पर्व श्रावण सुदी पूर्णिमा को पशु प्रवित्ति छोड़ने और मानवी आदर्श अपनाने की शपथ का हर वर्ष नवीनी करण
  5. जन्माष्टमी कृष्ण जयन्ती - भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी, पूर्ण पुरुष योगेश्वर श्री कृष्ण की समाज निर्माण की नीति अनुकरण, कर्मयोग की प्रेरणा का दिन
  6. विजयादशमी आश्विन सुदी दसमी को शोर्य पराक्रम एवं संगठन का पर्व, असुरत्व पर देवत्व की विजय का पर्व
  7. लक्ष्मी जयन्ती, दीपावली - कार्तिक के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को गणेश - लक्ष्मी पूजन के साथ आर्थिक समस्याओ के समाधान का सामयिक चिंतन
  8. गीता जयंती मार्ग शीर्ष सुदी एका दसी, कर्मयोग एवं कर्तव्य पालन की प्रधानता को जीवन में धारण करने की प्रेरणा का पर्व
  9. सरस्वती का जन्मदिन, वसन्त पर्व - माघ सुदी पंचमी साहित्य एवं कला का विस्तार करने की प्रेरणा का पर्व
  10. होली - फाल्गुन सुदी पूर्णिमा प्रहलाद के सत्याग्रह की विजय का दिन सामूहिक एवं स्वछता बढ़ाने का पर्व

इस पर्वो को यदि सामूहिक रूप से मनाया जाय तो समाज को सुविकसित बनाने के समस्त महत्त्वपूर्ण पर्वो पर प्रकाश डाला जा सकता है और जन साधारण को व्यक्तिवाद छोड़कर समाजवाद अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है

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